Sunday, 8 April 2012

डकैत आए, तो मारी मौत की छलांग

बचपन में देखता था कि अक्सर गर्मियों में देहरादून के परेड मैदान में नुमाइश लगती थी। आजकल नुमाइश का रूप ट्रेड फेयर ने ले लिया। कुछ ज्यादा झूले व दुकानें अब लगती हैं, लेकिन मौत की छलांग का खेल अब यहां नहीं दिखाई देता। नुमाइश में हर रात मेला समापन के समय मौत की छलांग का खेल होता था। बांस की सीड़ियों से करीब साठ  फुट से अधिक की ऊंचाई पर युवक चढ़ता और उसके चेहरे को कपड़े से ढक दिया जाता। युवक मोटे कपड़े पहने होता। जमीन पर पानी से भरा गड्ढा होता। फिर युवक के शरीर पर आग लगाई जाती। साथ ही पानी से भरे गड्ढे पर भी आग लगाई जाती। जब लपटें बढ़ जाती तो युवक छलांग लगाता और कुछ देर बाद पानी से सही सलामत बाहर निकलता। तब बताते थे कि ऐसा करतब दिखाने वाले को एक हजार रुपये मिलते हैं। तब मै सोचा करता कि मैं भी ऐसी ही मौत की छलांग लगाकार काफी पैसे वाला व्यक्ति बनूं।
आज देखता हूं कि व्यक्ति कुछ बनने के लिए कभी न कभी मौत की छलांग लगाता रहता है। उसका रूप भले ही बदल गया। अब आगे बढ़ने के लिए व्यक्ति रिस्क लेता है। यही रिस्क उसे कई बार सफल बना देता है और कई बार तो वह चूक जाता है। भले ही ऐसे रिस्क में उसकी मौत नहीं होती, लेकिन कई बार कैरियर ही खत्म हो जाता है। मौत की छलांग कई बार व्यक्ति परिस्थितिजन्य भी लगाता है। ऐसी छलांग खुद की जान बचाने को भी हो सकती है। इस छलांग से वह पैसे तो नहीं कमाता, लेकिन अपनी जान बचाने के लिए ही जान का जोखिम जरूर उठाता है।
करीब बारह साल पहले की बात है। देहरादून के सुनसान इलाके में स्थित एक स्कूल में रात को डकैती पड़ी। स्कूल परिसर में एक खेल प्रशिक्षक का घर था। टीचर रिटायर्ड फौजी था। रात को डकैतों ने सबसे पहले स्कूल के गार्ड को गोली मार दी। उसके बात टीचर के घर जाकर लूटपाट की। टीचर की पत्नी को मारपीट का घायल भी कर दिया।
कुछ दिन बाद पुलिस ने इस मामले का खुलासा किया। करीब पांच युवकों को पकड़कर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। साथ ही लूटा गया सामान सोने की चेन आदि की भी बरामदगी दिखाई। जब पत्रकारों के सामने पुलिस टीचर से पूछ रही थी कि चेन पहचानों तो उसका कहना था कि मेरी पत्नी ही पहचान सकती है। फिर उससे पूछा कि बदमाशों को पहचान सकता है। इस पर फिर उसने कहा कि मेरी पत्नी ही पहचान सकती है।
हर बात पर पत्नी को आगे करने पर मेरे मन में सवाल उठा कि आखिर डकैती के समय टीचर कहां था। उससे मैने यह सवाल भी किया। तब उसने बताया कि सच बात यह है कि मैं उस समय पलंग के नीचे था। उसने बताया कि जैसे ही बदमाश दरवाजा तोड़कर भीतर घुसे। वे पलंग के पास पहुंचे और रजाई खींच कर नीचे फेंकी। साथ ही डंडों से प्रहार किया। रजाई के साथ वह भी उछलकर बिस्तर से नीचे गिरा और फुर्ती से पलंग के नीचे जा सरका। पलंग पर उसकी पत्नी पर बच्चों को देख बदमाशों ने पहले पत्नी को डंडों से मारा। फिर उससे आलमारी व बक्सों की चाबी लेकर तलाशी शुरू कर दी। उसका कहना था कि यदि बदमाश उसे देखते तो निश्चित रूप से मार डालते। फौजी पहले दुश्मन की नजर से खुद को बचाता है, उसके बाद हमला करता है। यह कहकर वह रुक गया।
मैने उससे पूछा कि आपने हमला कब किया। उसने बताया कि वह हमले की स्थिति में नहीं था। बदमाशों के पास बंदूक व डंडे थे। उनकी संख्या भी काफी थी। वह उनकी नजरों से बचकर क्रोलिंग (कोहनी  के बल पर जमीन पर रेंगकर चलना) करता बाहर आया। घर से काफी दूर निकलकर उसने दौड़ लगाई और बगल के गांव के आबादी वाले इलाके में गया। वहां शोर मचाकर लोगों को एकत्र किया। तब घर पहुंचा। तब तक सभी बदमाश भाग चुके थे।
इस पूर्व फौजी ने बदमाशों की नजर से खुद को बचाने को मौत की छलांग लगाई। अपनी पत्नी और बच्चों को बदमाशों के हवाले कर दिया और खुद लोगों को एकत्र करने चला गया। इस घटना से मेरे मन में कई सवाल उठते हैं कि क्या फौजी ने सही कदम उठाया। या फिर उसे बदमाशों से भिड़ जाना था। भिड़ने पर यह रिस्क था कि उसकी जान जा सकती थी। या फिर उसे कोई दूसरा कदम उठाना था, जो न तो मुझे आज तक सूझ रहा है और न ही फौजी को भी तब सूझा होगा। 

                                                                                                       भानु बंगवाल

2 comments:

  1. सर आपने पूछा नहीं कि वह कौन ही फौज और बटालियन में था, जो संकट के समय अपनों की सुरक्षा करने के बजाए पहले अपनी जान की परवाह कर रहा था। लेकिन, एक बात और भी है यदि वह सिर्फ रिटायर फौजी होता तो शायद डकैतों से भिड जाता, लेकिन शिक्षक बनने के बाद उसमें परिवर्तन जरूरी था।

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